ग़ज़ल परवेज़ आलम غزل پرویز عالم

ग़ज़ल

परवेज़ “आलम”

पटना,बिहार

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जाँ शिकस्ता नहीं , हारा नहीं हूँ मैं
मौज ए दरया हूँ किनारा नहीं हूँ मैं

ख़ुद मैं दरया हूँ कि बहता ही रहा हूँ
कोई कश्ती का सहारा नहीं हूँ मैं

दस्तरस में हूँ तेरी बन के दिया मैं
माह ओ अंजुम का नज़ारा नहीं हूँ मैं

अपनी आग़ोश में ले आओ किसी दिन
ख़ुम ओ साग़र हूँ शरारा नहीं हूँ मैं

छोड़ दी मैं ने मुहब्बत की रिवायत
तुम नहीं गर तो तुम्हारा नहीं हूँ मैं

हर वरक़ को यूँ समझना नहीं आसाँ
एक रसाले का शुमारा नहीं हूँ मैं

है सदाक़त का सदाक़त से ही रिश्ता
हर किसी को तो गवारा नहीं हूँ मैं

मुन्तशिर हूँ ये अलग बात है ‘आलम ‘
गर्दिश ए वक़्त का तारा नहीं हूँ मैं

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غزل

پرویز عالم

پٹنہ، بہار

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جاں شکستہ نہیں، ہارا نہیں ہوں میں
موجِ دریا ہوں کنارہ نہیں ہو ں میں

خود میں دریا ہوں کہ بہتا ہی رہا ہوں
کوئی کشتی کا سہارا نہیں ہوں میں

دسترس میں ہوں تری بن کے دیا میں
ماہ و انجم کا نظارہ نہیں ہوں میں

اپنی آغوش میں لے آؤ کسی دن
خم و ساغر ہوں شرارہ نہیں ہوں میں

چھوڑ دی میں نے محبّت کی روایت
تم نہیں گر تو تمہارا نہیں ہوں میں

ہر ورق کو یوں سمجھنا نہیں آساں
اک رسالے کا شمارہ نہیں ہوں میں

ہے صداقت کا صداقت سے ہی رشتہ
ہر کسی کو تو گوارا نہیں ہوں میں

منتشر ہوں یہ الگ بات ہے ‘عالَم ‘
گردشِ وقت کا تارا نہیں ہوں میں

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ग़ज़ल सिया सचदेव غزل. سیا سچدیو

ग़ज़ल

सिया सचदेव
बरेली , उत्तर प्रदेश
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हर एक ख़्वाब की ख़ुद दफ्न की है लाश अभी
उभर गई है मेरी रूह पर खराश अभी

सुकून पा लूँ , बताती हूँ, थोड़ा दम ले लूँ
है लफ्ज़ लफ्ज़ में मौजूद इर्तियाश अभी

मैं सोचती थी उसे पा के मिल गयी दुनिया
कहाँ हुई है मुकम्मल मगर तलाश अभी

अभी गया कोई फेर कर नज़र अपनी
रगों से जान निकल जाए मेरी काश अभी

तेरा मिज़ाज बता दूँ मैं सारी दुनिया को
तेरे ख़ुलूस का मैं कर दूँ पर्दाफ़ाश अभी

अभी तो सर पे सिया ज़िम्मेदारियाँ है बहुत
तू ज़िंदगी से न हो इतना भी निराश अभी
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غزل

سیا سچدیو

بریلی، اتر پردیش

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ہر ایک خواب کی خود دفن کی ہے لاش ابھی
ابھر گئ ہے میری روح پر خراش ابھی

سکوں پا لوں، بتاتی ہوں، تھوڑا دم لے لوں
ہے لفظ لفظ میں موجود ارتعاش ابھی

میں سوچتی تھی اسے پا کے مل گئ دنیا
کہاں ہوئ ہے مکمل مگر تلاش ابھی

ابھی گیا کوئ پھیر کر نظر اپنی
رگوں سے جان نکل جائے میری کاش ابھی

تیرا مزاج بتا دوں میں ساری دنیا کو
تیرے خلوص کا میں کر دوں پردہ فاش ابھی

ابھی تو سر پہ سیا ذمہ داریاں ہیں بہت
تو زندگی سے نہ ہو اتنا بھی نراش ابھی

ग़ज़ल ۔۔۔۔۔शकील आज़मी غزل. شکیل اعظمی

ग़ज़ल
शकील आज़मी
मुम्बई , हिंदुस्तान
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अपनी हस्ती को मिटा दूँ ,तेरे जैसा हो जाऊँ
इस तरह चाहूँ तुझे ,मैं तेरा हिस्सा हो जाऊँ

पायलें बाँध के बरिश की ,करूँ रक़्स ए जनुँ
तू घटा बन के बरस और मैं सहरा हो जाऊँ

दूर तक ठहरा हुआ झील का पानी हूँ मैं
तेरी परछाई जो पड़ जाए तो दरिया हो जाऊँ

शहर दर शहर मेरे इश्क़ की नोबत बाजे
मैं जहाँ जाऊँ तेरे नाम से रुसवा हो जाऊँ

आदमी बन के बहुत मैं ने तुझे सजदे किये
तू खुदा बन के मुझे मिल मैं फरिश्ता हो जाऊँ

इस तरह मिल ,के बिछड़ने का तस्सवुर न रहे
इस तरह माँग मुझे तू, के मैं तेरा हो जाऊँ

इतना बीमार के साँसों से धुआँ उठता है
आ तुझे देख लूँ और देख के अच्छा हो जाऊँ

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غزل

شکیل اعظمی
ممبئ،ہندوستان

اپنی ہستی کو مٹا دوں ترے جیسا ہو جاؤں
اس طرح چاہوں تجھے میں ترا حصہ ہو جاؤں

پائلیں باندھ کے بارش کی کروں رقص جنوں
تو گھٹا بن کے برس اور میں صحرا ہو جاؤں

دور تک ٹھہرا ہوا جھیل کا پانی ہوں میں
تیری پرچھائیں جو پڑ جائے تو دریا ہو جاؤں

شہر در شہر مرے عشق کی نوبت باجے
میں جہاں جاؤں ترے نام سے رسوا ہو جاؤں

آدمی بن کے بہت میں نے تجھے سجدے کیے
تو خدا بن کے مجھے مل میں فرشتہ ہو جاؤں

اس طرح مل کہ بچھڑنے کا تصور نہ رہے
اس طرح مانگ مجھے تو کہ میں تیرا ہو جاؤں

اتنا بیمار کہ سانسوں سے دھواں اٹھتا ہے
آ تجھے دیکھ لوں اور دیکھ کے اچھا ہو جاؤں

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ग़ज़ल चाँदनी पाण्डेय. غزل چاندنی پانڈے

ग़ज़ल
चाँदनी पाण्डेय
कानपुर
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नयी पोशाक पहने है पुराने ख़्वाब की हसरत
मैं हंसकर टाल देती हूँ दिले बेताब की हसरत

मुहब्बत और क्या है ? इक सराबे तश्नगी तो है
वही सहरा की चम चम में चमकते आब की हसरत

नया किरदार गढ़कर मैं कहानी ही बदल देती
मगर पूरी न हो पाई नए इक बाब की हसरत

तुम्हारी याद का गहरा तअल्लुक़ आँसुओ से है
मेरी पलको को क्या होगी किसी सैलाब की हसरत

बस इतना सोच कर उस ओर कश्ती मोड़ दी मैंने
निकल जाए न क्यों कर इस दफा गिरदाब की हसरत

ज़मीं पे थक के गिर जाऊँ तो शायद नींद आ जाये
के इन आँखों को है इक उम्र से इक ख़्वाब की हसरत

غزل

چاندنی پانڈے
کانپور

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نئ پوشاک پہنے ہے ،پرانے خواب کی حسرت
میں ہنس ٹال دیتی ہوں دل بےتاب کی حسرت

محبت اور کیا ہے؟ اک سرابِ تشنگی تو ہے
وہی صحرا کی چم چم میں چمکتے آب کی حسرت

نیا کردار گڑھ کر میں کہانی ہی بدل دیتی
مگر پوری نہ ہو پائ نئے اک باب کی حسرت

تمہاری یاد کا گہرا تعلق آنسوؤں سے ہے
میری پلکوں کو کیا ہوگی کسی سیلاب کی حسرت

بس اتنا سوچ کر اس اور کشتی موڑ دی میں نے
نکل جائے نہ کیوں کر اس دفعہ گرداب کی حسرت

زمیں پہ تھک کے گر جاوں تو شاید نیند آ جائے
کہ ان آنکھوں کو ہے اک عمر سے اک خواب کی حسرت

ग़ज़ल आतिफ़ कमाल राणा غزل عاطف کمال رعنا

आतिफ़ कमाल राणा

पाकिस्तान

ग़ज़ल

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जब उस पर फूल आएँगे तो हैरानी बनेगी
मुहब्बत कुछ दिनों में रात की रानी बनेगी

वो साया है तो थोड़ी देर सुस्ता लेंगे उसमें
वो दलदल है तो रस्ते में परेशानी बनेगी

बनाया जा चुका है दिल में इक दशत- ए- तमन्ना
अब इसमें आमद -ए- गौल-ए-बियाबानी बनेगी

ये दिन, अख़रोट जैसा दिन नहीं बनता किसी से
तो फिर ये रात किस जादू से खुबानी बनेगी

मेरा आंसु बहाने का ये पहला वाकिया है
किसी दरवेश का कहना था तुग्यानी बनेगी

अज़ादारी भी गोया शाइरी जैसा हुनर है
मेरे मातम से मेरी चाक दामानी बनेगी

चलो माना ये तस्वीरें दरिंदों की हैं लेकिन
इन्हें आपस में जोड़ो नस्ले इंसानी बनेगी

तुम्हारा दीदा-ए-नम तो ज़मीं पर बह रहा है
फलक पर चाँद निकले गा तो पेशानी बनेगी

غزل

عاطف کمال رانا

پاکستان

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جب اس پر پھول آئیں گے تو حیرانی بنے گی
محبت کچھ دنوں میں رات کی رانی بنے گی

وہ سایہ ہے تو تھوڑی دیر سستا لیں گے اس میں
وہ دلدل ہے تو رستے میں پریشانی بنے گی

بنایا جا چکا ہے دل میں اک دشت – تمنا
اب اس میں آمد – غول – بیابانی بنے گی

یہ دن اخروٹ جیسا دن نہیں بنتا کسی سے
تو پھر یہ رات کس جادو سے خوبانی بنے گی

مرا آنسو بہانے کا یہ پہلا واقعہ ہے
کسی درویش کا کہنا تھا طغیانی بنے گی

عزاداری بھی گویا شاعری جیسا ہنر ہے
مرے ماتم سے میری چاک دامانی بنے گی

چلو مانا یہ تصویریں درندوں کی ہیں لیکن
انہیں آپس میں جوڑو نسل – انسانی بنے گی

تمہارا دیدہ ء نم تو زمیں پر بہہ رہا ہے
فلک پر چاند نکلے گا تو پیشانی بنے گی

ग़ज़ल संजय कुमार कुंदन غزل سنجئے کمار کندن

ग़ज़ल

संजय कुमार कुंदन

पटना,बिहार

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कुछ भी नहीं करना था उसको बस अहदो-पैमान हुए
उसने हमेशा दिया भरोसा हमपर ये एहसान हुए

राहे-जुनूँ पे चल नहीं पाए,अक़्लो-ख़िरद भी भूल गए
इक रस्ता पकड़ा,इक छोड़ा हम हरदम हलकान हुए

हम तो सच्चे लोग हैं लेकिन तुम जैसे हुशियार नहीं
सबकी नज़रों में तुम दाना हम तो फ़क़त नादान हुए

मन तो है कुछ आज थका-सा और बदन भी टूटा-सा
वक़्त लगे है बोझल-बोझल लम्हे सब बेजान हुए

ये भी सच है हम हँसते थे और ज़रा ये झूठ भी है
फूल खिले थे वीरानों में और गुलशन वीरान हुए

दुनिया,तुझको लगता होगा टूट गए हम झुक भी गए
तेरी इस नादानी पे हम रह-रहकर हैरान हुए

एक हवस थी ‘कुन्दन जी’ की कह दें जो महसूस करें
जाँ से गए वो इस कोशिश में और बहुत हलकान हुए

غزل
سنجئے کمار کندن
پٹنہ، بہار
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کچھ نہیں کرنا تھا اسکو بس عہد و پیمان ہوئے
اس نے ہمیشہ دیا بھروسہ ہم پر یہ احسان ہوئے

راہِ جنوں پہ چل نہیں پائے عقل و خرد بھی بھول گئے
اک رستہ پکڑا، اک چھوڑا، ہم ہر دم ہلکان ہوئے

ہم تو سچے لوگ ہیں لیکن تم جیسے ہشیار نہیں
سب کی نظروں میں تم دانا ہم تو فقط نادان ہوئے

من تو ہے کچھ آج تھکا سا اور بدن بھی ٹوٹا سا
وقت لگے ہے بوجھل بوجھل، لمحے سب بےجان ہوئے

یہ بھی سچ ہے ہم ہنستے تھے اور ذرا یہ جھوٹ بھی ہء
پھول کھلے تھے ویرانوں میں اور گلشن ویران ہوئے

دنیا، تجھ کو لگتا ہوگا ٹوٹ گئے ہم جھک بھی گئے
تیری اس نادانی پہ ہم رہ رہ کر حیران ہوئے

ایک ہوس تھی کندن جی کی کہ دیں جو محسوس کریں
جاں سے گیے وہ اس کوشش میں ،اور بہت ہلکان ہوئے

नज़्म जावेद नदीम نظم جاوید ندیم

नज़्म

“द्रोणाचार्य आज भी जिंदा है ”

जावेद नदीम
मुम्बई, महाराष्ट्र
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अधर्मता की पराकाष्ठा थी वो
जब द्रोणाचार्य ने यकलव्य से अंगूठा मांगा था!

“पहाड़ अपनी जगह से हट गया”
“समुद्र सुष्क हो गया”
“मरुस्थल उपवन बन गया”
विश्वास कर लेना!

पाखंडी , पाखंड से विमुख हुआ
विश्वास मत करना !

द्रोणाचार्य आज भी ज़िंदा है
और जब जब एकलव्य का अंगूठा विक्सित होता है
वह मांग लेता है !

نظم

“درونا چاریہ آج بھی زندہ ہے ”

جاوید ندیم
ممبئ، ہندوستان
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کمینے پن کی انتہا تھی وہ
جب دروناچاریہ نے یک لویہ سے انگوٹھا مانگا تھا!

پہاڑ اپنی جگہ سے ہٹ گیا
سمندر خشک ہو گیا
صحرا گلزار بن گیا
یقین کر لینا !

عیار، عیاری سے تائب ہوا
یقین مت کرنا
دروناچاریہ آج بھی زندہ ہے
اور جب یک لویہ کا انگوٹھا نمو پاتا ہے
وہ مانگ لیتا ہے!